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चित्र तथा मूर्ति हेतु वास्तु


# आजकल प्रायः घरों, मीटिंग रूम में, कार्यालय में तथा मंदिर आदि में इंटिरीअर डिज़ाइन के लिए विभिन्न चित्र तथा मूर्ति का प्रयोग किया जाता है। वैदिक ग्रंथों में विभिन्न कार्य तथा स्थान के उपयोग के अनुसार चित्र तथा मूर्ति के प्रयोग के शुभ अशुभ फलों पर विचार किया गया है।


देवादी

# अपने ईष्ट को या जिसमें भक्ति हो उनको छोड़ कर किसी भी देवी-देवता आदि की तस्वीर, फ़ोटो, मूर्ति, पिक्चर, चित्र आदि घर में नहीं लगवाना चाहिए।

# एक ही रूम में अलग अलग प्रकार के देवता का चित्रण आदि नहीं करना चाहिए। समान ऊर्जा वाले देवी देवता का ही चित्रण साथ में किया जाता है। जैसे राम मंदिर में राम दरबार तथा लीला एवम देवी के मंदिर में सिंह तथा देवी के लीला आदि का चित्रण होता है।


मनुष्य

# ऐसे व्यक्तियों के चित्र/फ़ोटो घर में नहीं लगाना चाहिए जो सन्यासी हो, जिन्होंने गृहस्थ धर्म धारण नहीं किया हो या त्याग दिया हो।

# जिन चित्रों में पीड़ा का चित्रण किया गया हो, जिनमें मन या शरीर के असहज स्थिति का चित्रण हो उन्हें भी नहीं लगाना चाहिए।


रस


# झूले के क्रीड़ाओं का चित्रण अशुभ है, इससे मन अस्थिर होता है।

# संग्राम आदि के चित्र से मन में उग्र भाव जागृत होते है जिससे परिवार में कलह या विवाद की स्थिति होती है।

# तात्विक दृष्टि से कथानकों, काव्यों, नाटकों आदि में जो मनो भाव जागृत होते है उन्हें रस कहते है। ये नौ प्रकार के रस कहे गए हैं - अदभुत, करुणा, भयानक, रौद्र, विभत्स, वीर, शांत, श्रृंगार और हास्य।

# घर में उपरोक्त मे से हास्य व श्रृंगार रस के अतिरिक्त अन्य रस का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जैसा चित्रण करोगे उसी प्रकार के भाव जागृत होंगे।


भवन, वृक्, पशु-पक्षी

# अग्नि से जलते हुए भवन, वाहन तथा वन का चित्रण प्रयोज्य नहीं है।


# वृक्षों के चित्रण में ऐसे वृक्ष जो फूल-फल से रहित है, सूखे हैं, जिनमें शुष्कता, निरस्तता है, जो उत्साह का वर्धन नहीं करते है, का चित्रण नहीं करना चाहिए। इससे निराशा, हताशा, डिप्रेशन आने की आशंका अधिक रहती है तथा जीवन में निरस्तता आती है।

# विभिन्न रात्रिचर, मांसाहारी, पशु-पक्षी के चित्रण भी निषिद्ध कहे गए है। जैसे बाज, गिद्ध आदि जिनकी प्रकृति आक्रामक है, वस्तुओं को छीनने की है, उनके चित्रण से ऐसे ही गुण विकसित होते है।

# हिंसक प्रवृत्ति क्रियाशील होने पर परिवार या घर का वातावरण असंतुलित हो जाता है इसलिए ऐसे चित्रण का घरों के लिए, बैठक कक्ष, ड्रॉइंग रूम, बेडरूम आदि सभी स्थानो में निषेध किया गया है।


प्रयोज्य

# ईष्ट देव जिसकी आराधना पूजा व्यक्ति करता है, जिन देवों के प्रति मन में विशेष भाव है तथा कुल देवता की प्रतिमा या चित्र उनके दिशा के अनोरूप रख सकते है।

# घर में चल प्रतिमा का ही प्रयोग करना चाहिए। स्थिर प्रतिमा घर के लिए उपयुक्त नहीं है।

# बहुत अधिक सतोगुण घृहस्त जीवन में उदासीनता की आशंका बनी रहेती है अतः एक हस्त से अधिक प्रमाण की प्रतिमा घर में नहीं होनी चाहिए।



प्रतिहार

# मुख्य द्वार में दो द्वारपाल आकर्षक हों, युवा हों तथा सजे हुए हों। एसा करने से प्रवेश वाले के मन में उत्साह का संचार हो ता है, विशिष्ठता का भाव जागृत होता है।

# मुख्य द्वार को भव्य, मनमोहक तथा आकर्षक बनाने में निवेश करना चाहिए।


निधि, अष्ट मंगला गौरी, लक्ष्मी


# निधि का चित्रण इस प्रकार करना चाहिए जिसे देख कर मन में समृद्धता का भाव जाग्रत हो। इसका चित्रण ऐसी देवी के रूप में करना चाहिए जिनके मुख में रत्न हो और चित्रण में शंख तथा अशर्फ़ियाँ हों।

# द्वार पर, कमल पर बैठी हुई पूर्ण कुम्भ वाली, रत्नों और वस्त्रों से विभूषित, पुष्प, फल, और पल्लव से भरे हुए घड़े, अंकुश, छत्र, बेल, शीशा तथा शंख और मछलियों की मालाओं से विभूषित अष्ट मंगला गौरी रखना चाहिए।

# द्वार मंडल के मध्य भाग में खूब सजी हुई लक्ष्मी जी लगाना चाहिए। लक्ष्मीजी को उत्तम हाथियों के सूंड से स्नान करायी जानी वाली, कमल पर बैठी हुई, और कमल हाथ में लिए हुए चित्रण करना चाहिए।



बाहरी एवम भीतरी दीवारों में तथा अन्य चित्रण


# वृक्ष, गाय (माला से सजी हुई अपने बछड़े के साथ) चित्र, भिन्न भिन्न पत्र-लता, खाने योग्य फल, पुष्प तथा फलों से लदे हुए शाल वृक्ष का चित्रण करना चाहिए।

# पत्र लता के साथ हंस, कारंड और चक्र आदि के भी चित्रण किए जा सकते है।



# अपनी भुजाओं से खेलते हुए बालकों का चित्रण किया जा सकता है।

# घर की दीवारों के नीचे के भागों में कदम्ब, हिरण, क्रोंच, हंस और सरस, किनारे पर उगी हुई वानिर और केतकी के समूह, मछली और कमल आदि का चित्रण करना चाहिए।


भोजन कक्ष, आदि

# डाइनिंग हॉल में कमल के पत्ते में मणि अथवा कंचन के बर्तन में रस, फल आदि खाने योग्य वस्तुयें रखे हो, ऐसा चित्रण करना चाहिए।

# दिव्य मनुष्यों से सम्बंधित आख्यान आदि में जितने चित्र शुभ वर्णित है वे सभी प्रयोग में लिए जा सकते है।



वास्तु, ऐस्ट्रो वास्तु एवम गीता कॉन्सल्टेशन हेतु वास्तु आचार्य आर्किटेक्ट रोहित खण्डेलवाल @ आयतन वेद के मोबाइल +91-9993317711, ईमेल: support@aayatanveda.com तथा website: www.aayatanveda.com में संपर्क कर सकते हैं